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SIR विवाद पर चुनाव आयोग की बड़ी सफाई, विपक्ष की बैठक से बढ़ी राजनीतिक हलचल

27 सितंबर 2026 | नई दिल्ली

भारत में चुनावी राजनीति से जुड़ा एक बड़ा विवाद इन दिनों चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर चल रहा है। मतदाता सूची के इस विशेष पुनरीक्षण को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता नामों के सत्यापन और प्रक्रिया में कथित आंतरिक मतभेदों पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया कि देशभर में SIR लागू करने का निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी से लिया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसके कानूनी आधार को बरकरार रखा है।

इस पूरे विवाद ने अब राजनीतिक रूप ले लिया है। विपक्षी INDIA ब्लॉक ने 30 सितंबर को नई दिल्ली में बैठक बुलाने का फैसला किया है, जबकि चुनाव आयोग ने उसी दौरान SIR प्रक्रिया को लेकर कई प्रशासनिक बदलावों की घोषणा की है। इनमें कुछ मतदाताओं के लिए व्यक्तिगत सुनवाई की आवश्यकता हटाना, बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर जाकर दस्तावेज लेना और दिल्ली तथा महाराष्ट्र में दावे एवं आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाना शामिल है।

SIR क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

Special Intensive Revision यानी SIR चुनावी मतदाता सूची की विस्तृत समीक्षा की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना, पात्र मतदाताओं को शामिल करना तथा मृत, स्थानांतरित या अन्य कारणों से अयोग्य हो चुके नामों की पहचान करना है।

SIR की प्रक्रिया पहले बिहार में शुरू हुई और बाद में इसे अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। मई 2026 में केंद्र सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, तीसरे चरण में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था। इस चरण में लगभग 36.73 करोड़ मतदाताओं के लिए घर-घर जाकर प्रक्रिया पूरी करने हेतु 3.94 लाख से अधिक Booth Level Officers तैनात किए जाने की जानकारी दी गई थी।

यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम होना उसके चुनाव में मतदान करने के अधिकार से सीधे जुड़ा है। इसी कारण नाम जोड़ने, हटाने या सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर काफी ध्यान दिया जा रहा है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

सितंबर में The Indian Express की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें मतदाता सूची, नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और चुनावी डेटा के IT सिस्टम से संबंधित मुद्दे शामिल थे।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ प्रशासनिक और तकनीकी फैसलों को लेकर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में उन्होंने यह चिंता जताई कि महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में सभी आयुक्तों की पर्याप्त भागीदारी नहीं थी।

इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू किए और SIR को लेकर अपनी आपत्तियां दोहराईं।

हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि SIR से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। इसलिए आंतरिक मतभेदों से जुड़े प्रकाशित दावों और आयोग की आधिकारिक स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

चुनाव आयोग की 26 सितंबर की बैठक

विवाद के बीच 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में बैठक की।

बैठक के बाद आयोग ने एक विस्तृत बयान जारी किया। आयोग ने कहा कि 24 जून 2025 को जारी देशव्यापी SIR आदेश को तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से मंजूरी मिली थी।

आयोग ने यह भी कहा कि बाद के चरणों के लिए जारी कार्यक्रमों को भी सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई थी। इसके अलावा, आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में SIR से संबंधित आदेश की वैधता को बरकरार रखा था।

यह स्पष्टीकरण मौजूदा विवाद के बीच आयोग की आधिकारिक स्थिति को स्पष्ट करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर क्या कहा था?

SIR विवाद का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू सुप्रीम कोर्ट का 27 मई 2026 का फैसला है।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में चुनावी मतदाता सूची के SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला देते हुए प्रक्रिया के कानूनी आधार को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 और संबंधित चुनावी कानूनों के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण की शक्ति है।

हालांकि, अदालत के फैसले में मतदाता सूची से नाम हटाने और नागरिकों को अपने दावे प्रस्तुत करने की प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बिहार की प्रक्रिया के संदर्भ में बताया गया कि लगभग 65 लाख मतदाता ड्राफ्ट रोल से बाहर रह गए थे क्योंकि उन्होंने Enumeration Form जमा नहीं किया था। अदालत ने इन मतदाताओं के नाम और उन्हें बाहर रखने के कारण सार्वजनिक करने तथा प्रभावित लोगों को अपने दावे पेश करने का अवसर देने के निर्देश दिए थे।

इसलिए SIR की कानूनी वैधता और किसी व्यक्ति के नाम को अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने की प्रक्रिया—ये दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

अब मतदाताओं के लिए क्या बदला?

26 सितंबर की बैठक में चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया में कुछ महत्वपूर्ण बदलावों की घोषणा की।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उन मतदाताओं से जुड़ा है जिन्हें unmapped records या logical discrepancies के कारण नोटिस जारी किए गए हैं।

आयोग ने कहा कि ऐसे मतदाताओं को सामान्य परिस्थितियों में Electoral Registration Officer के सामने व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं होना पड़ेगा। इसके बजाय Booth Level Officers उनके घर जाकर आवश्यक दस्तावेज एकत्र करेंगे और उन्हें ECINet प्रणाली पर अपलोड करेंगे।

व्यक्तिगत सुनवाई केवल असाधारण परिस्थितियों में होगी और आयोग ने इसे संभव होने पर ऑनलाइन आयोजित करने की बात कही है।

यह बदलाव उन मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जिन्हें दस्तावेज जमा करने या नोटिस का जवाब देने के लिए व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों के सामने उपस्थित होने में कठिनाई हो सकती है।

दिल्ली और महाराष्ट्र में समयसीमा बढ़ी

चुनाव आयोग ने कुछ राज्यों में SIR से जुड़े दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा भी बढ़ाई है।

दिल्ली में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर तक बढ़ाई गई है, जबकि इनके निपटारे की समयसीमा 30 नवंबर तक की गई है।

महाराष्ट्र में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 12 अक्टूबर तक बढ़ाई गई है और इनके निपटारे के लिए 10 नवंबर तक का समय निर्धारित किया गया है।

इन विस्तारों का उद्देश्य पात्र मतदाताओं को अपने दस्तावेज और दावे प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय देना है।

गोवा में 97 मतदाताओं का मामला

चुनाव आयोग ने गोवा में SIR प्रक्रिया से जुड़े एक मामले पर भी जानकारी दी।

आयोग के अनुसार, 97 मतदाता ऐसे पाए गए जो प्रारंभिक प्रक्रिया में बाहर रह गए थे। इनमें से 81 ने Form 6 भरकर मतदाता सूची में शामिल होने के लिए आवेदन कर दिया है। आयोग ने Booth Level Officers को ऐसे मतदाताओं तक पहुंचने और उनकी सहायता करने का निर्देश दिया है।

यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान केवल नाम हटाने या सत्यापन ही नहीं, बल्कि छूट गए पात्र मतदाताओं को सूची में वापस शामिल करने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है।

विपक्ष ने क्या कहा?

चुनाव आयोग की सफाई के बावजूद विपक्षी दलों ने विवाद खत्म नहीं माना है।

INDIA ब्लॉक ने 30 सितंबर को बैठक बुलाने का फैसला किया है। बैठक में SIR, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की आगे की रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है।

विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई और SIR प्रक्रिया को रोकने की मांग की है। कुछ दलों ने यह भी कहा है कि चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग को अधिक पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए।

ये विपक्षी दलों के राजनीतिक दावे और मांगें हैं; चुनाव आयोग ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।

सत्ता पक्ष और सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया

सत्तारूढ़ पक्ष के नेताओं ने चुनाव आयोग की 26 सितंबर की सफाई का समर्थन किया है।

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने विपक्ष के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं। वहीं NDA के कुछ सहयोगी दलों ने भी इससे पहले चुनाव आयोग से विवाद को लेकर सार्वजनिक स्पष्टीकरण देने की मांग की थी।

इससे एक दिलचस्प राजनीतिक स्थिति बनी है। विपक्ष आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार और उसके सहयोगी चुनाव आयोग की नवीनतम आधिकारिक सफाई को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

TMC और CPI(M) भी एक मुद्दे पर साथ

पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी रहे तृणमूल कांग्रेस (TMC) और CPI(M) ने भी SIR और चुनाव आयोग के मुद्दे पर आपसी संपर्क बढ़ाया है।

CPI(M) महासचिव एम. ए. बेबी ने विपक्षी दलों से बैठक करने का आग्रह किया था और ममता बनर्जी से भी बातचीत की। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों दल पश्चिम बंगाल में लंबे समय से एक-दूसरे के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं।

हालांकि, यह सहयोग व्यापक राजनीतिक गठबंधन में बदलाव का प्रमाण नहीं है। फिलहाल यह विशेष रूप से चुनाव आयोग और मतदाता सूची के मुद्दे पर समन्वय के रूप में सामने आया है।

चुनाव आयोग ने IT सिस्टम पर भी कदम उठाए

SIR विवाद में केवल मतदाता सूची ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम को लेकर भी सवाल उठे हैं।

आयोग ने कहा है कि ECINet और उससे जुड़े डिजिटल सिस्टम की समीक्षा की जाएगी। भविष्य में नए IT मॉड्यूल और डिजिटल पहलों से जुड़े फैसलों के लिए अधिक चर्चा और जांच की व्यवस्था की जाएगी। आयोग ने अपनी बैठकों में एजेंडा पहले से प्रसारित करने और बैठक के मिनट्स तैयार करने की व्यवस्था पर भी जोर दिया है।

इसका उद्देश्य निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और रिकॉर्डेड बनाना है।

आगे क्या होगा?

अब सभी की नजर 29 और 30 सितंबर के घटनाक्रम पर है।

कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक 29 सितंबर को प्रस्तावित है, जबकि INDIA ब्लॉक की बैठक 30 सितंबर को होगी। विपक्षी दल SIR और चुनाव आयोग को लेकर अपनी संयुक्त रणनीति पर चर्चा कर सकते हैं।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया में प्रशासनिक बदलाव लागू करने शुरू कर दिए हैं और कुछ राज्यों में मतदाताओं को अतिरिक्त समय दिया है।

आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राजनीतिक मंचों पर भी चर्चा का विषय बन सकता है।

विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य

मौजूदा स्थिति को समझने के लिए कुछ तथ्यों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

पहला, SIR देशभर में चरणबद्ध तरीके से चल रही चुनावी मतदाता सूची की समीक्षा प्रक्रिया है।

दूसरा, सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार के SIR की कानूनी वैधता को बरकरार रखा था।

तीसरा, चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को कहा कि देशव्यापी SIR का मूल आदेश और उसके चरणों से संबंधित निर्णय तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे।

चौथा, दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है।

पांचवां, आयोग ने मतदाताओं के लिए कुछ प्रक्रियाओं को आसान बनाने के नए कदम घोषित किए हैं, जिनमें घर से दस्तावेज लेने की व्यवस्था और कुछ समयसीमाओं का विस्तार शामिल है।

इसलिए वर्तमान विवाद को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसका सीधा संबंध मतदाता सूची, चुनावी प्रशासन, संस्थागत पारदर्शिता और नागरिकों के मतदान अधिकार से है।

सितंबर के अंतिम सप्ताह में होने वाली राजनीतिक बैठकों और चुनाव आयोग द्वारा लागू किए जा रहे नए प्रशासनिक उपायों से यह स्पष्ट होगा कि विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल चुनाव आयोग अपनी SIR प्रक्रिया को वैध और सर्वसम्मति से स्वीकृत बता रहा है, जबकि विपक्ष प्रक्रिया और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अतिरिक्त जवाबदेही और बदलाव की मांग कर रहा है।

स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग के 26 सितंबर 2026 के बयान, सुप्रीम कोर्ट का 27 मई 2026 का फैसला, PIB, Reuters/राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टें और The Indian Express की रिपोर्टिंग। रिपोर्ट में राजनीतिक दलों के आरोपों को उनके पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं लिखा गया है।

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