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‘हैलो, मैं दिव्या बोल रही हूं…’: ग्वालियर के वरिष्ठ CA से 21 करोड़ की साइबर ठगी, 218 दिनों में ऐसे बिछाया गया जाल

“हैलो… मैं दिव्या बोल रही हूं।”

एक सामान्य-सा WhatsApp संदेश। सामने खुद को निवेश सलाहकार बताने वाली एक महिला और बातचीत में बड़े मुनाफे का दावा। ग्वालियर में सामने आए एक बड़े साइबर फ्रॉड मामले की शुरुआत कथित तौर पर कुछ इसी तरह हुई। पुलिस में दर्ज शिकायत और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शहर के 70 वर्षीय वरिष्ठ चार्टर्ड अकाउंटेंट अशोक विजयवर्गीय से ऑनलाइन ट्रेडिंग और क्रिप्टो निवेश के नाम पर करीब ₹21 करोड़ 5 लाख 92 हजार की ठगी की गई।

अशोक विजयवर्गीय मध्यप्रदेश चेंबर ऑफ कॉमर्स से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी और निर्वाचन अधिकारी बताए गए हैं। मामले में राज्य साइबर सेल में शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज की गई है और पुलिस बैंक खातों, WhatsApp नंबरों तथा कथित फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म की जांच कर रही है।

दिसंबर 2025 में शुरू हुआ संपर्क

रिपोर्टों के अनुसार, मामले की शुरुआत दिसंबर 2025 में हुई। विजयवर्गीय के WhatsApp पर एक अज्ञात नंबर से संदेश आया। संदेश भेजने वाली ने खुद को “दिव्या सिंह” नाम की निवेश सलाहकार बताया और ऑनलाइन ट्रेडिंग तथा क्रिप्टो निवेश में आकर्षक मुनाफे की बात कही।

लगातार बातचीत के जरिए कथित सलाहकार ने भरोसा बनाने की कोशिश की। इसके बाद विजयवर्गीय को एक कथित ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने के लिए कहा गया। वहां USDT और बिटकॉइन जैसी क्रिप्टो परिसंपत्तियों में निवेश के विकल्प दिखाए गए।

यहीं से साइबर ठगी का वह तरीका शुरू हुआ जिसे अक्सर investment scam या fake trading platform fraud कहा जाता है। इसमें पीड़ित को एक ऐसी वेबसाइट या डिजिटल डैशबोर्ड दिखाया जाता है जहां उसका निवेश लगातार बढ़ता हुआ नजर आता है, लेकिन स्क्रीन पर दिखाई देने वाला लाभ वास्तविक रूप से निकाला नहीं जा सकता।

पहले मुनाफा देकर जीता भरोसा

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कथित ठगों ने शुरुआत में केवल मुनाफे का दावा नहीं किया, बल्कि रिपोर्टों के अनुसार विजयवर्गीय के बैंक खाते में करीब ₹1.88 लाख की रकम भी भेजी गई।

यही शुरुआती भुगतान भरोसा जीतने का बड़ा हथियार बना।

जब किसी निवेशक को पहली बार वास्तविक रकम वापस मिलती है, तो उसे लगता है कि प्लेटफॉर्म सही तरीके से काम कर रहा है। इसके बाद वह पहले से अधिक रकम निवेश करने के लिए तैयार हो सकता है।

रिपोर्टों के मुताबिक, इसके बाद अलग-अलग चरणों में बड़ी रकम कथित तौर पर कई बैंक खातों में भेजी गई। यह प्रक्रिया महीनों तक चलती रही और कुल ट्रांसफर की गई रकम ₹21 करोड़ से अधिक पहुंच गई।

स्क्रीन पर दिखने लगा 33 करोड़ से अधिक का ‘मुनाफा’

कथित ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर विजयवर्गीय की निवेश राशि और मुनाफा लगातार बढ़ता हुआ दिखाया गया। रिपोर्टों के अनुसार, एक समय उनके खाते में करीब ₹33.25 करोड़ की राशि दिखाई देने लगी।

लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब उन्होंने इस रकम को निकालने की कोशिश की।

कथित तौर पर उनसे कहा गया कि पैसे निकालने से पहले लगभग ₹10.84 करोड़ का टैक्स जमा करना होगा। इसके बाद भी अलग-अलग कारणों से अतिरिक्त रकम की मांग की गई। बाद में “रिस्क मार्जिन” जैसी शर्तें भी सामने रखी गईं।

यहीं पीड़ित को संदेह गहराया। परिचितों से चर्चा के बाद उन्हें एहसास हुआ कि जिस प्लेटफॉर्म पर करोड़ों रुपये का लाभ दिखाई दे रहा था, वह वास्तविक निवेश प्लेटफॉर्म नहीं हो सकता।

इसके बाद साइबर सेल में शिकायत की गई। रिपोर्टों के अनुसार, शिकायत 7 जुलाई 2026 को दी गई और 11 जुलाई को एफआईआर दर्ज की गई।

पुलिस अब डिजिटल मनी ट्रेल की जांच में जुटी

मामले में अभी जांच जारी है। इसलिए “दिव्या” नाम से संपर्क करने वाला व्यक्ति वास्तव में कौन था, यह जांच पूरी होने से पहले निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

रिपोर्टों के मुताबिक, जांच एजेंसियां उन बैंक खातों की पड़ताल कर रही हैं जिनमें रकम ट्रांसफर की गई। WhatsApp नंबरों, डिजिटल ट्रांजेक्शन, कथित फर्जी ट्रेडिंग पोर्टल, आईपी एड्रेस और अन्य तकनीकी सबूतों की भी जांच की जा रही है।

ऐसे मामलों में साइबर अपराधी अक्सर कई बैंक खातों और डिजिटल पहचान का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए स्क्रीन पर दिखाई देने वाला नाम या प्रोफाइल वास्तविक अपराधी की पहचान हो, यह जरूरी नहीं है।

यही कारण है कि इस मामले में भी किसी व्यक्ति विशेष को दोषी घोषित करने के बजाय पुलिस जांच के निष्कर्ष का इंतजार करना महत्वपूर्ण है।

एक वरिष्ठ CA भी कैसे फंस सकते हैं?

इस मामले ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—वित्तीय मामलों का दशकों का अनुभव रखने वाला व्यक्ति इतनी बड़ी साइबर ठगी का शिकार कैसे हो सकता है?

इसका जवाब साइबर अपराधियों की बदलती रणनीति में छिपा है।

आधुनिक साइबर फ्रॉड केवल तकनीकी हैकिंग पर निर्भर नहीं करते। कई ठगी social engineering पर आधारित होती हैं। अपराधी धीरे-धीरे भरोसा बनाते हैं, शुरुआत में छोटा लाभ देते हैं, फिर निवेश की रकम बढ़वाते हैं और फर्जी डिजिटल डैशबोर्ड पर बड़ा मुनाफा दिखाते रहते हैं।

पीड़ित को लगता है कि वह लगातार पैसा कमा रहा है। लेकिन जब वह रकम निकालना चाहता है, तब टैक्स, प्रोसेसिंग फीस, सिक्योरिटी डिपॉजिट या रिस्क मार्जिन के नाम पर और पैसे मांगे जाते हैं।

ग्वालियर का यह मामला इसी तरह के कथित पैटर्न का एक बेहद बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।

सबसे बड़ा सबक: स्क्रीन पर दिख रहा ‘प्रॉफिट’ पैसा नहीं होता

इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि किसी ऐप या वेबसाइट पर दिखाई देने वाली रकम को वास्तविक लाभ नहीं माना जा सकता।

अनजान WhatsApp नंबर से मिली निवेश सलाह, कम समय में असाधारण मुनाफे का दावा, अपरिचित वेबसाइट पर ट्रेडिंग और निकासी से पहले “टैक्स” या “फीस” के नाम पर अतिरिक्त भुगतान की मांग—ये सभी बड़े खतरे के संकेत हो सकते हैं।

किसी भी निवेश से पहले प्लेटफॉर्म की वैधता और नियामकीय स्थिति की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए। केवल WhatsApp चैट, ऑनलाइन डैशबोर्ड या शुरुआती छोटे भुगतान को भरोसे का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

21 करोड़ की ठगी ने खड़े किए गंभीर सवाल

ग्वालियर का यह मामला केवल एक व्यक्ति के आर्थिक नुकसान की कहानी नहीं है। यह दिखाता है कि साइबर अपराधी अब लंबे समय तक चलने वाले और मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद योजनाबद्ध फ्रॉड कर रहे हैं।

करीब सात महीने तक चले इस कथित जाल में पहले संपर्क किया गया, फिर भरोसा बनाया गया, शुरुआती लाभ दिया गया, बड़ी रकम निवेश कराई गई और अंत में निकासी रोककर अतिरिक्त भुगतान मांगा गया।

अब पुलिस जांच से यह सामने आना बाकी है कि इस नेटवर्क के पीछे कौन लोग थे, पैसा किन खातों से होकर गुजरा और कितनी रकम वापस हासिल की जा सकती है।

फिलहाल यह मामला देश के हर डिजिटल निवेशक के लिए एक बड़ी चेतावनी है: ऑनलाइन दिखाई देने वाला मुनाफा तब तक वास्तविक नहीं है, जब तक पैसा सुरक्षित रूप से आपके अपने खाते में वापस न आ जाए।

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