
दुनिया की सात सबसे बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं (G7) ने चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों ने ‘क्रिटिकल मिनरल्स अलायंस’ (Critical Minerals Alliance) बनाने पर सहमति जताई है। इस गठबंधन का उद्देश्य लिथियम, निकल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को सुरक्षित बनाना और किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी आधुनिक तकनीकों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इन सभी क्षेत्रों के लिए आवश्यक खनिजों की प्रोसेसिंग में चीन का दबदबा है, जिससे कई देशों को अपनी आपूर्ति सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।
क्यों है यह फैसला इतना महत्वपूर्ण?
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल तेल और गैस पर निर्भर नहीं है। भविष्य की तकनीकों के लिए जिन खनिजों की आवश्यकता है, उन्हें “क्रिटिकल मिनरल्स” कहा जाता है।
इनका उपयोग होता है:
- इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरियों में
- मोबाइल और लैपटॉप निर्माण में
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सर्वर में
- रक्षा उपकरणों और मिसाइल प्रणालियों में
- सोलर पैनल और विंड टर्बाइन जैसी हरित ऊर्जा परियोजनाओं में
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन खनिजों की आपूर्ति बाधित होती है, तो पूरी वैश्विक तकनीकी और औद्योगिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
जी7 की नई रणनीति क्या है?
जी7 देशों ने केवल नया गठबंधन बनाने की घोषणा ही नहीं की, बल्कि एक व्यापक रणनीति भी तैयार की है।
प्रमुख निर्णय:
- महत्वपूर्ण खनिजों की संयुक्त आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना।
- अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के साथ मिलकर नया समन्वय मंच बनाना।
- आपूर्ति में किसी एक गैर-जी7 देश की हिस्सेदारी को 2030 तक 60% से नीचे लाने का लक्ष्य।
- खनिजों का रणनीतिक भंडारण (Strategic Stockpiling) बढ़ाना।
- नए खनन और प्रोसेसिंग प्रोजेक्ट्स में निवेश बढ़ाना।
- संकट की स्थिति में सदस्य देशों के बीच तेज़ समन्वय स्थापित करना।
चीन क्यों बना चिंता का विषय?
दुनिया में रेयर अर्थ और कई अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के प्रोसेसिंग सेक्टर में चीन का लगभग एकाधिकार माना जाता है। पिछले वर्षों में चीन द्वारा कुछ खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण वैश्विक उद्योगों को आपूर्ति संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा था।
इसी अनुभव के बाद अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य विकसित देशों ने वैकल्पिक आपूर्ति नेटवर्क विकसित करने की दिशा में तेजी से काम शुरू किया है।
भारत के लिए क्या मायने हैं?
भारत के लिए यह घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
देश के पास लिथियम, रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की खोज तथा प्रोसेसिंग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं हैं। यदि वैश्विक कंपनियां चीन के अलावा अन्य देशों में निवेश बढ़ाती हैं, तो भारत को नई परियोजनाएं, रोजगार और विदेशी निवेश आकर्षित करने का अवसर मिल सकता है।
साथ ही भारत “मेक इन इंडिया” और सेमीकंडक्टर मिशन के तहत वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों की राय
हालांकि जी7 की योजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पर निर्भरता कम करना आसान नहीं होगा।
इसके लिए आवश्यक होगा:
- नए खनन प्रोजेक्ट्स विकसित करना।
- प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाना।
- अरबों डॉलर का निवेश।
- पर्यावरणीय मंजूरियों में तेजी।
- वैश्विक सहयोग और दीर्घकालिक नीतियां।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में “क्रिटिकल मिनरल्स” वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का उतना ही महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं, जितना कभी तेल हुआ करता था।
आगे क्या?
जी7 देशों का यह कदम केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहन, AI और हरित ऊर्जा का विस्तार होगा, वैसे-वैसे इन खनिजों की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है।
ऐसे में दुनिया अब ऐसी सप्लाई चेन बनाना चाहती है जो किसी एक देश पर निर्भर न हो। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यापार, तकनीकी उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
