
नई दिल्ली | 14 सितंबर 2026
भारत की राजनीति में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) एक बार फिर चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार वाले सभी 21 राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इस बयान के बाद देश में कानून, समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक रणनीति को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।
अमित शाह का यह बयान UCC को लेकर केंद्र और भाजपा की दीर्घकालिक प्राथमिकता को दर्शाता है। हालांकि, यह घोषणा एक राजनीतिक लक्ष्य और भरोसे के रूप में सामने आई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी 21 राज्यों में कानून तत्काल लागू हो गया है। प्रत्येक राज्य में विधायी प्रक्रिया, नियमों की तैयारी और अन्य संवैधानिक आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी।
क्या है समान नागरिक संहिता (UCC)?
समान नागरिक संहिता एक ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना है, जिसमें धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय नागरिक मामलों में समान कानूनी नियम लागू किए जाएं। इसका संबंध मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और परिवार से जुड़े अन्य नागरिक विषयों से होता है।
भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए कुछ व्यक्तिगत कानून मौजूद हैं। इन कानूनों में विवाह, संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों से जुड़े नियम अलग हो सकते हैं। UCC का उद्देश्य इन विषयों पर एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है।
उदाहरण के लिए, यदि विवाह या उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग समुदायों में अलग हैं, तो UCC के तहत इन मामलों में एक समान व्यवस्था लाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, समान नागरिक संहिता का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कानून में कौन-कौन से प्रावधान शामिल किए जाते हैं।
अमित शाह ने क्या कहा?
13 सितंबर को मुंबई में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि कई राज्यों में समान नागरिक संहिता को आगे बढ़ाया जा चुका है। उन्होंने विश्वास जताया कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और NDA द्वारा शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब समान नागरिक संहिता भाजपा के प्रमुख राजनीतिक और नीतिगत मुद्दों में शामिल है। पार्टी लंबे समय से देश में नागरिक कानूनों में समानता की बात करती रही है। UCC को उसके चुनावी वादों और व्यापक सुधार एजेंडे के हिस्से के रूप में भी देखा जाता है।
गौरतलब है कि 2029 में अगला लोकसभा चुनाव प्रस्तावित है। इसलिए गृह मंत्री की घोषणा को आगामी राजनीतिक समयसीमा से जोड़कर देखा जा रहा है।
किन राज्यों में UCC को लेकर आगे बढ़ा काम?
समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कुछ राज्यों ने पहले ही कदम उठाए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उत्तराखंड इस क्षेत्र में सबसे आगे रहने वाला राज्य है। इसके अतिरिक्त गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में भी UCC से संबंधित विधायी या नीतिगत कदमों की जानकारी सामने आई है।
उत्तराखंड: सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण
उत्तराखंड ने फरवरी 2024 में समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून पारित किया था। यह कानून जनवरी 2025 में लागू हुआ। उत्तराखंड का UCC विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे विषयों को लेकर नियमों का एक साझा ढांचा प्रस्तुत करता है।
इस कानून में कुछ समुदायों और विशेष रूप से जनजातीय परंपराओं से जुड़े प्रावधानों को लेकर अलग व्यवस्थाएं रखी गई हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि UCC लागू करते समय स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर भी विचार किया जा सकता है।
गुजरात, असम और मध्य प्रदेश
गुजरात और असम में UCC से संबंधित विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। मध्य प्रदेश में भी इस दिशा में कदम उठाए गए हैं। हालांकि, किसी राज्य में विधेयक पारित होना और कानून का वास्तविक रूप से लागू होना दो अलग-अलग चरण हैं।
कानून के लागू होने के लिए अधिसूचना, नियमों का निर्माण और अन्य आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ सकती हैं। इसलिए राज्यों की स्थिति का आकलन करते समय केवल घोषणा या विधेयक पारित होने को अंतिम क्रियान्वयन नहीं माना जाना चाहिए।
UCC के संभावित फायदे क्या हो सकते हैं?
समान नागरिक संहिता के समर्थकों का मानना है कि इससे नागरिक कानूनों में समानता और स्पष्टता बढ़ सकती है। इसके कुछ संभावित लाभ निम्नलिखित हैं:
1. कानूनी समानता को बढ़ावा: समर्थकों के अनुसार, समान नागरिक मामलों में एक जैसे नियम होने से नागरिकों के बीच कानूनी समानता की भावना मजबूत हो सकती है।
2. महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा: विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार से संबंधित नियमों में सुधार के माध्यम से महिलाओं को अधिक कानूनी सुरक्षा देने का उद्देश्य रखा जा सकता है। हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कानून में महिलाओं के अधिकारों को किस प्रकार परिभाषित किया गया है।
3. कानूनों को समझना आसान: अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जटिलता कम होने पर नागरिकों के लिए अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझना आसान हो सकता है।
4. न्यायिक प्रक्रिया में स्पष्टता: समान नियमों से कुछ नागरिक विवादों में कानूनी व्याख्या सरल होने की संभावना हो सकती है। हालांकि, इससे न्यायिक मामलों में कितनी कमी आएगी, यह कानून के वास्तविक स्वरूप और उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
UCC को लेकर क्या हैं चुनौतियां?
समान नागरिक संहिता का मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और संवैधानिक रूप से भी संवेदनशील है। भारत की विविधता को देखते हुए इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानून
भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। विभिन्न समुदायों की अपनी धार्मिक और सामाजिक परंपराएं हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि समान नागरिक कानून बनाते समय संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच उचित संतुलन बना रहे।
जनजातीय परंपराओं की सुरक्षा
देश के कई आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाएं और रीति-रिवाज अलग हैं। विवाह, उत्तराधिकार और परिवार से संबंधित उनकी परंपराओं को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा। उत्तराखंड और अन्य राज्यों में जनजातीय समुदायों के लिए अलग प्रावधानों की चर्चा इसी चुनौती को रेखांकित करती है।
राजनीतिक सहमति
NDA में कई राजनीतिक दल शामिल हैं और सभी राज्यों की सामाजिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। कुछ सहयोगी दलों और विपक्षी पार्टियों ने UCC को लेकर व्यापक चर्चा और सहमति की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसलिए 21 राज्यों में इसे लागू करने के लिए राजनीतिक संवाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
केंद्र और राज्यों की भूमिका
भारत में व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े कई विषयों पर केंद्र और राज्यों की विधायी शक्तियां आपस में जुड़ी हुई हैं। राज्यों के स्तर पर कानून बनाने और लागू करने की प्रक्रिया में संवैधानिक प्रावधानों का पालन आवश्यक होगा। इसी कारण UCC को राज्य-दर-राज्य लागू करने की रणनीति पर भी चर्चा हो रही है।
2029 से पहले UCC लागू करने की रणनीति क्यों महत्वपूर्ण है?
अमित शाह की घोषणा से संकेत मिलता है कि NDA सरकार UCC को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दे सकती है। राज्य सरकारें अपने-अपने सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हालात के अनुसार कानून तैयार कर सकती हैं।
राज्य स्तर पर कानून लागू करने से सरकारों को स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन करने, नियम बनाने और प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने का अवसर मिल सकता है। दूसरी ओर, अलग-अलग राज्यों में अलग प्रक्रिया अपनाए जाने से कानूनों के स्वरूप और उनके क्रियान्वयन को लेकर सवाल भी उठ सकते हैं।
इसलिए 2029 से पहले सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य कितना सफल होता है, यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, विधायी प्रक्रिया, न्यायिक समीक्षा और जनता के बीच संवाद पर निर्भर करेगा।
आम नागरिकों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि किसी राज्य में UCC लागू होता है, तो वहां विवाह पंजीकरण, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने या लिव-इन संबंधों से जुड़े नियमों में बदलाव हो सकता है। नागरिकों को नए कानूनों के अनुसार अपनी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ सकती हैं।
हालांकि, किसी भी राज्य के नागरिकों पर प्रभाव समझने के लिए उस राज्य के वास्तविक कानून और नियमों का अध्ययन करना जरूरी होगा। केवल UCC लागू होने की घोषणा के आधार पर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि हर नागरिक के सभी पारिवारिक अधिकार या जिम्मेदारियां किस प्रकार बदल जाएंगी।
निष्कर्ष
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य बताना भारतीय राजनीति और कानून व्यवस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह घोषणा UCC को लेकर सरकार की प्राथमिकता को सामने रखती है।
समान नागरिक संहिता के समर्थक इसे कानूनी समानता, महिलाओं के अधिकारों और नागरिक कानूनों में स्पष्टता से जोड़ते हैं, जबकि आलोचक धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक संतुलन को लेकर चिंताएं व्यक्त करते हैं।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभिन्न राज्य इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं, कानूनों का वास्तविक स्वरूप क्या होता है और जनता तथा राजनीतिक दलों के बीच इस विषय पर कितनी सहमति बन पाती है। 2029 से पहले UCC लागू करने का लक्ष्य अब देश की राजनीतिक और कानूनी बहस का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।
