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पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक 2026: 177 देशों में भारत 176वें स्थान पर, रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

पर्यावरण संरक्षण आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है। इसी बीच Environmental Performance Index (EPI) 2026 की नई रिपोर्ट चर्चा में है, जिसमें भारत को 177 देशों में 176वां स्थान मिलने का दावा किया गया है।

यदि यह रैंकिंग सही आंकड़ों पर आधारित है, तो यह भारत के पर्यावरणीय प्रदर्शन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि भारत सरकार ने पहले भी EPI की कार्यप्रणाली (Methodology) पर आपत्ति जताई है और इसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप नहीं माना है।

क्या है Environmental Performance Index (EPI)?

Environmental Performance Index (EPI) एक अंतरराष्ट्रीय सूचकांक है, जो विभिन्न देशों के पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास (Sustainable Development) से जुड़े प्रयासों का मूल्यांकन करता है। इसमें कई पर्यावरणीय मानकों के आधार पर देशों की रैंकिंग तय की जाती है।

इस इंडेक्स में मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों का मूल्यांकन किया जाता है—

  • वायु गुणवत्ता (Air Quality)
  • जल गुणवत्ता (Water Resources)
  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
  • जैव विविधता (Biodiversity)
  • वन संरक्षण (Forest Conservation)
  • कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emissions)
  • कचरा प्रबंधन (Waste Management)
  • पर्यावरणीय नीतियां

भारत की रैंकिंग क्यों चर्चा में है?

रिपोर्ट के अनुसार भारत को 177 देशों में 176वां स्थान दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि पर्यावरण संरक्षण के कई मानकों पर भारत का प्रदर्शन काफी कमजोर बताया गया है।

हालांकि, भारत सरकार का कहना है कि EPI की रैंकिंग तय करने में अपनाई गई कार्यप्रणाली भारतीय परिस्थितियों और विकासशील देशों की चुनौतियों को पूरी तरह नहीं दर्शाती। सरकार पहले भी इस सूचकांक के कुछ मानकों पर सवाल उठा चुकी है।

किन कारणों से पर्यावरण पर बढ़ रहा है दबाव?

भारत तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है, लेकिन विकास के साथ कई पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।

1. वायु प्रदूषण

देश के कई बड़े शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल होते रहे हैं। वाहनों का धुआं, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण और निर्माण कार्य इसकी प्रमुख वजह हैं।

2. जल प्रदूषण

नदियों और जलाशयों में औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू कचरे के कारण पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

3. जंगलों पर दबाव

शहरीकरण, सड़क निर्माण और औद्योगिक विस्तार के कारण कई क्षेत्रों में वन क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।

4. कचरा प्रबंधन

भारत में हर दिन लाखों टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इसका वैज्ञानिक तरीके से निपटान अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

5. जलवायु परिवर्तन

बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, हीटवेव और बाढ़ जैसी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दर्शाती हैं।

भारत सरकार के प्रयास

पर्यावरण संरक्षण के लिए भारत सरकार कई योजनाएं और अभियान चला रही है, जिनमें शामिल हैं—

  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP)
  • नमामि गंगे मिशन
  • मिशन LiFE (Lifestyle for Environment)
  • सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध
  • इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा
  • सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार
  • बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान

इन पहलों का उद्देश्य प्रदूषण कम करना और सतत विकास को बढ़ावा देना है।

आम नागरिक क्या कर सकते हैं?

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक छोटे-छोटे कदम उठाकर बड़ा बदलाव ला सकता है।

  • एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का कम उपयोग करें।
  • सार्वजनिक परिवहन या कार पूल का उपयोग करें।
  • बिजली और पानी की बचत करें।
  • अधिक से अधिक पेड़ लगाएं।
  • कचरे को अलग-अलग करके रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दें।
  • पर्यावरण अनुकूल उत्पादों का उपयोग करें।

क्या केवल रैंकिंग से किसी देश का मूल्यांकन किया जा सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय सूचकांक को समझते समय उसकी कार्यप्रणाली, डेटा स्रोत और मूल्यांकन के मानकों को भी देखना जरूरी होता है। रैंकिंग एक संकेत देती है, लेकिन किसी देश की पूरी पर्यावरणीय स्थिति को केवल एक संख्या से नहीं समझा जा सकता।

भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश में जनसंख्या, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना एक जटिल चुनौती है।

निष्कर्ष

Environmental Performance Index 2026 में भारत की 176वीं रैंक चर्चा का विषय बनी हुई है। चाहे इस रैंकिंग को लेकर अलग-अलग मत हों, लेकिन यह स्पष्ट है कि वायु प्रदूषण, जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर लगातार काम करने की आवश्यकता है।

सरकार, उद्योगों और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयासों से ही पर्यावरण संरक्षण को मजबूत बनाया जा सकता है। स्वच्छ और हरित भारत केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भागीदारी से ही संभव है।

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