
भारत के तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्र में सेमीकंडक्टर निर्माण को लेकर बड़ी प्रगति सामने आई है। देश अब केवल मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की असेंबली तक सीमित रहने के बजाय चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, एडवांस्ड पैकेजिंग, मशीनरी, रिसर्च और तकनीकी कौशल के पूरे इकोसिस्टम को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सितंबर 2026 में आयोजित SEMICON India 2026 के दौरान केंद्र सरकार ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में हुई प्रगति और अगले चरण की योजनाओं को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, भारत में अब पांच सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर चुके हैं। इन प्लांटों से बनने वाले चिप्स का इस्तेमाल घरेलू जरूरतों के साथ-साथ निर्यात के लिए भी किया जा रहा है।
सरकार के अनुसार, Semicon 2.0 के तहत करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश कमिटमेंट प्राप्त हो चुके हैं। इन निवेशों से अगले दो से तीन वर्षों में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में करीब एक लाख नई रोजगार संभावनाएं पैदा होने की उम्मीद जताई गई है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सेमीकंडक्टर?
सेमीकंडक्टर यानी चिप आज लगभग हर आधुनिक तकनीक की बुनियाद है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, कार, सर्वर, 5G उपकरण, सैटेलाइट, ड्रोन, मेडिकल डिवाइस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम और रक्षा उपकरणों में अलग-अलग प्रकार के चिप्स का इस्तेमाल होता है।
दुनिया में चिप निर्माण की सप्लाई चेन कुछ प्रमुख देशों और कंपनियों में काफी केंद्रित रही है। ऐसे में किसी वैश्विक संकट, व्यापारिक तनाव या सप्लाई में रुकावट का असर ऑटोमोबाइल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उद्योग तक पहुंच सकता है।
इसी वजह से भारत अपने घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। इसका उद्देश्य केवल भारत में चिप बनाना नहीं है, बल्कि डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, टेस्टिंग, मशीनरी, सामग्री और रिसर्च तक पूरी वैल्यू चेन तैयार करना है।
पांच सेमीकंडक्टर प्लांट उत्पादन में
हालिया जानकारी के अनुसार भारत में पांच सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर चुके हैं। सरकार के मुताबिक इन प्लांटों में तैयार होने वाले कुछ चिप्स का निर्यात भी किया जा रहा है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय तक सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के लिए बड़ी मात्रा में विदेशी सप्लाई पर निर्भर रहा है।
अब घरेलू उत्पादन बढ़ने से भारतीय कंपनियों को स्थानीय स्तर पर चिप और पैकेजिंग सुविधाएं मिलने की संभावना बढ़ रही है। साथ ही, भारत वैश्विक कंपनियों के लिए सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का एक वैकल्पिक केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
Semicon 2.0 पर बड़ा फोकस
जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने Semicon 2.0 को मंजूरी दी थी। इस कार्यक्रम के लिए कुल ₹1,27,500 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया है।
Semicon 2.0 को छह प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित किया गया है—चिप डिजाइन, मशीनरी और सामग्री, नए फैब्स, एडवांस्ड ATMP/OSAT पैकेजिंग, रिसर्च एवं डेवलपमेंट और टैलेंट डेवलपमेंट।
इसका अर्थ है कि सरकार केवल चिप फैक्ट्री बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए आवश्यक मशीनें, केमिकल्स, गैस, पैकेजिंग तकनीक, डिजाइन सॉफ्टवेयर और प्रशिक्षित इंजीनियरों का नेटवर्क भी विकसित किया जाएगा।
चिप डिजाइन में भारत की ताकत
भारत पहले से ही दुनिया के प्रमुख देशों में से एक है जहां बड़ी संख्या में इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ चिप डिजाइन से जुड़े काम करते हैं।
Semicon 2.0 के तहत सरकार का लक्ष्य लगभग 200 सेमीकंडक्टर डिजाइन स्टार्टअप तैयार करने का है।
पहले चरण में 105 स्टार्टअप्स और कंपनियों को इंडस्ट्री-ग्रेड Electronic Design Automation यानी EDA टूल्स तक पहुंच दी गई थी। EDA टूल्स का इस्तेमाल चिप डिजाइन और उसके परीक्षण के लिए किया जाता है।
सरकार के अनुसार, इनमें से 20 स्टार्टअप्स को वेंचर कैपिटल फंडिंग भी मिल चुकी है। इसका उद्देश्य भारत में केवल सर्विस आधारित टेक्नोलॉजी कंपनियां बनाना नहीं, बल्कि अपने स्वयं के चिप डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी विकसित करने वाली कंपनियों को बढ़ावा देना है।
70 हजार डिजाइन इंजीनियरों की ट्रेनिंग
सेमीकंडक्टर उद्योग में सिर्फ फैक्ट्री होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित इंजीनियर, तकनीशियन, क्लीनरूम विशेषज्ञ और मैन्युफैक्चरिंग प्रोफेशनल्स की आवश्यकता होती है।
सरकार के अनुसार पिछले चार वर्षों में करीब 70,000 डिजाइन इंजीनियरों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
करीब 400 इंजीनियरिंग कॉलेजों के छात्रों को इंडस्ट्री-ग्रेड EDA टूल्स तक पहुंच भी दी गई है। इसका उद्देश्य छात्रों को केवल थ्योरी तक सीमित रखने के बजाय उन्हें वास्तविक चिप डिजाइन प्रक्रिया से जोड़ना है।
आने वाले चरण में प्रशिक्षण का दायरा केवल चिप डिजाइन तक सीमित नहीं रहेगा। सिस्टम डिजाइन और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कौशल पर भी ध्यान दिया जाएगा।
गुजरात भी सेमीकंडक्टर हब की दौड़ में
भारत के सेमीकंडक्टर मिशन में गुजरात की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। गुजरात के धोलेरा क्षेत्र में सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट विकसित किए जा रहे हैं।
हालिया घोषणाओं में Tata Electronics और Ascendas First Space के बीच 363 एकड़ के वेंडर पार्क के विकास को लेकर समझौता भी शामिल है। इसका उद्देश्य सेमीकंडक्टर फैब के आसपास सप्लायर और मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को विकसित करना है।
ऐसे वेंडर पार्क इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि किसी एक चिप फैक्ट्री को सफलतापूर्वक चलाने के लिए केवल मुख्य प्लांट ही पर्याप्त नहीं होता। उसके आसपास कंपोनेंट, मशीनरी, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, केमिकल्स और अन्य सप्लायरों का नेटवर्क भी आवश्यक होता है।
सेमीकंडक्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा
सेमीकंडक्टर उद्योग का महत्व केवल आर्थिक नहीं है। इसका संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है।
रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले रडार, मिसाइल सिस्टम, ड्रोन, कम्युनिकेशन उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अंतरिक्ष तकनीक में विशेष प्रकार के चिप्स की जरूरत होती है।
अगर महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स की सप्लाई पूरी तरह विदेशी स्रोतों पर निर्भर हो, तो वैश्विक तनाव या सप्लाई चेन बाधित होने की स्थिति में रणनीतिक जोखिम बढ़ सकता है।
इसीलिए भारत के सेमीकंडक्टर मिशन का एक उद्देश्य महत्वपूर्ण तकनीकी सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और लचीला बनाना भी है। सरकार ने Semicon 2.0 के उद्देश्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा और सप्लाई चेन रेजिलिएंस को भी शामिल किया है।
AI और सेमीकंडक्टर का बढ़ता संबंध
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से विस्तार ने सेमीकंडक्टर की मांग को और बढ़ा दिया है।
AI मॉडल चलाने वाले डेटा सेंटरों में बड़ी संख्या में हाई-परफॉर्मेंस चिप्स, मेमोरी और नेटवर्किंग उपकरणों की आवश्यकता होती है। भारत में AI सर्वर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का इकोसिस्टम भी विकसित हो रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार AI, इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप मैन्युफैक्चरिंग को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में देखना मुश्किल होता जा रहा है। भविष्य में AI सर्वर, ऑटोमोबाइल, स्मार्टफोन, रोबोटिक्स और इंडस्ट्रियल सिस्टम के लिए चिप्स की मांग बढ़ने की संभावना है।
इसी कारण भारत अपने सेमीकंडक्टर कार्यक्रम को AI और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के साथ जोड़ने पर भी जोर दे रहा है।
चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं
भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन इस उद्योग को विकसित करना आसान नहीं है।
सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने में अरबों डॉलर का निवेश लग सकता है। इसके अलावा अत्यधिक शुद्ध पानी, बिजली, विशेष गैसों, रसायनों, अत्याधुनिक मशीनरी और प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।
चिप मैन्युफैक्चरिंग में गुणवत्ता और उत्पादन की निरंतरता भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीय प्लांटों को लागत, गुणवत्ता और समय—तीनों स्तरों पर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रदर्शन करना होगा।
इसीलिए Semicon 2.0 में मशीनरी, सामग्री, रिसर्च, पैकेजिंग और टैलेंट को अलग-अलग प्राथमिकता दी गई है।
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर संभावित असर
अगर भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम लगातार विकसित होता है, तो इसका असर केवल चिप उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा।
मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, टेलीकॉम, रक्षा, एयरोस्पेस, मेडिकल टेक्नोलॉजी और AI सर्वर जैसे क्षेत्रों को घरेलू सप्लाई चेन से फायदा मिल सकता है।
इसके साथ ही भारत में नई कंपनियों, स्टार्टअप्स और सप्लायरों के लिए भी अवसर पैदा हो सकते हैं। चिप डिजाइन से लेकर टेस्टिंग और पैकेजिंग तक अलग-अलग स्तरों पर नए कारोबार विकसित होने की संभावना है।
सरकार के अनुसार Semicon 2.0 के तहत करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश कमिटमेंट पहले ही प्राप्त हो चुके हैं और इनसे करीब एक लाख रोजगार अवसरों के निर्माण की उम्मीद है। हालांकि वास्तविक रोजगार और निवेश का स्तर परियोजनाओं के क्रियान्वयन तथा कंपनियों की मंजूरी और निवेश योजनाओं पर निर्भर करेगा।
भारत की टेक्नोलॉजी यात्रा में नया चरण
भारत का सेमीकंडक्टर सेक्टर अब शुरुआती चरण से आगे बढ़कर उत्पादन और बड़े पैमाने पर इकोसिस्टम निर्माण के चरण में पहुंच रहा है।
पांच प्लांटों का कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होना, करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश कमिटमेंट, 200 डिजाइन स्टार्टअप्स का लक्ष्य और हजारों इंजीनियरों की ट्रेनिंग इस क्षेत्र में हो रहे बदलाव को दर्शाती है।
आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत कितनी तेजी से चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग, मशीनरी और सामग्री निर्माण में अपनी घरेलू क्षमता बढ़ाता है।
सेमीकंडक्टर उद्योग की सफलता केवल फैक्ट्री लगाने से तय नहीं होगी। इसके लिए मजबूत सप्लाई चेन, विश्वस्तरीय प्रतिभा, रिसर्च, निजी निवेश, वैश्विक साझेदारी और लगातार तकनीकी उन्नयन की जरूरत होगी।
फिलहाल, सितंबर 2026 की स्थिति में भारत ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण पार किया है। पांच सेमीकंडक्टर प्लांट कमर्शियल उत्पादन में आ चुके हैं और Semicon 2.0 के माध्यम से सरकार पूरे इकोसिस्टम को विस्तार देने की कोशिश कर रही है।
यदि ये परियोजनाएं निर्धारित योजनाओं के अनुसार आगे बढ़ती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत की भूमिका वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही, देश में डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और तकनीकी रोजगार के नए अवसर विकसित हो सकते हैं।
भारत की चिप कहानी अब केवल भविष्य की योजना नहीं रह गई है—देश में उत्पादन शुरू हो चुका है, निवेश सामने आ रहे हैं और अगला लक्ष्य पूरे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करना है।
